मैं अपने गाँव की बात करुँ तो हमारे यहाँ पर जब कभी पानी टूट जाता है तो 10-10 दिनों तक पानी ही नहीं आता, कभी लाईट खराब हो जाये तो लाईनमेन को हाथ जोड़ते-जोड़ते 10 दिन का टाईम लग जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमारे गाँव में जब लगभग पूरा गाँव पलायन कर चूका है तब जाके मोटर मार्ग की स्वीकृति हुई, ओर 2 महिने पहले कार्य भी हुआ, लेकिन सड़क बनने से पुराने पैदल मार्ग पूर्णरुप से क्षतिग्रस्त हो गये। खैर मोटर मार्ग की खुशी थी तो ये सब भी कोई बात नहीं लेकिन बरसात शुरु होते ही सड़क पूरी तरह टूट गयी उस पर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया। अब गाँव वालों के पास अन्य कोई भी रास्ता नजदीकी बाजार जाने के लिये नहीं है। ग्रामीणों ने सबंधित विभाग के ठेकेदार से सम्पर्क भी किया पर बात वही कि वहां के चार लोग हमारा क्या बिगाड़ लेंगे, इस प्रकार की विचार धारा लिये हूए कोई भी व्यक्ति हमारी समस्या कैसे सुनेगा, या हमारी बात सरकार तक कैसे पहुंचेगी।
आज एक हफ्ता होने को आया है लेकिन रास्ता नहीं बना, 14 जून को लाईट खराब हो गयी थी अभी तक नहीं बनी। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अचानक बीमार हो जाता तो कैसे उसको उपचार के लिये ले जायेंगे पहले ही गाँव की क्या स्थिति है वो मैने आपको बता दी है।
उत्तराखंड में इस प्रकार के जितने भी गाँव हैं वहाँ के लगभग यही हाल है। क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ऐसे गांवों में वोटर भी नहीं होते इसलिए कोई भी नेता चाहे वो उस ग्राम सभा का प्रधान ही क्यों ना हो ऐसे गांवों पर ध्यान नहीं देता, अब आप ही बतायें कि हम जैसे लोग अपना दुख किसे बतायें।
सरकार से यदि कुछ नहीं होता तो पलायन हो चुके गाँवो में जहाँ असमर्थ लोग ही बहुत कम संख्या में रह रहें हैं उन लोगों को इच्छामृत्यु दे देनी चाहिए। या फिर हर घर तक सुविधा पहुंचाने की बात को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जन-जन तक पहुंचाना चाहिए। हालांकि यह एक सुनहरा ख्वाब लगता है बस।
कैलाश देवली


वास्तविकता को दर्शाता ये मार्मिक पोस्ट...... 😭😭
ReplyDeleteसच मैं🙄🙏🏻
ReplyDeleteसहियोग करें उन लोगो का जो इस विपत्ती का सामना कर रहे हैं।
ReplyDeleteEk dusre ka sath de aise time pe
ReplyDeleteजगाने का प्रयास करें सभी को 🙏🏻
ReplyDeleteएक क्रान्ति उठी थी उत्तराखण्ड को बनाने में💪🏻
अब एक क्रान्ति और चाहिए उत्तराखण्ड को बचाने में। 💪🏻